व्यंग्य

पड़ी कलेजे छेक….

 

“मीरा बहन, ये क्या? तुम्हारे हाथ में झाड़ू! और ये भी कैसी अजीब सी झाड़ू है?”

“कबीर भाई ये डिज़ाइनर झाड़ू है। आजकल बड़े बड़े मंत्री, अधिकारी, सेलिब्रिटीज झाड़ू के साथ फोटो खिंचा के गौरवान्वित होते हैं। लेकिन आपके होंठो पर ये व्यंग्य भरी मुस्कान क्यों?”

“बहना सोचता हूँ, अब ये जुलाहे का काम छोड़ कर, झाड़ू बनाने का काम करने लगूँ। तुम्हारी बात से समझ में आ रहा है, भारत देश में झाड़ू स्टेटस सिंबल बन गयी है।”

“हाँ, कबीर भाई पहले एक राजनैतिक पार्टी ने झाड़ू को अपना चुनाव चिन्ह बनाया था तो पूरी प्रजा झाड़ू लेकर क्रान्ति की राह पर निकल पड़ी थी, जिससे बरसों पुरानी सत्ताधारी पार्टी की सफाई हो गयी। आँसू बहाते हुए, पंजा उठाये उनके जत्थे गाते हुए निकले… बड़े बे आबरू होकर राजनैतिक कूचे  से हम निकले। पर जिस पार्टी ने सफाई कर्मी बन कर यह पुण्य कार्य किया था, उनकी झाड़ू को तोड़-ताड़ दिया गया। अब नयी झाड़ू कमल के फूल के साथ सज कर आ गयी। वज़ीरे आज़म का स्वच्छ भारत अभियान मीडिया की सुर्ख़ियों में छ गया। पहले झाड़ू वाले को देख कर रास्ता बदलने वाले अब उनसे हाथ जोड़ कर झाड़ू लेने लगे। समाचार पत्र बड़े-बड़े उद्योगपतियों, कॉमेडिअन्स, ट्रेजेडी किंग्स, इन शार्ट बोले तो,  सारी सेलिब्रिटीज की फोटुएँ छापने लगे। झाड़ू नयी फैशन एक्सेसरीज के तौर पर उभरी है। वो दिन दूर नहीं जब बड़े बड़े मॉल्स में सिर्फ झाड़ुओं के स्टोर्स होंगे। कबीर भाई, पर आपको एक राज़ की बात बताऊँ, पिछली बार मैं ऐसे ही हाई फाई लोगों के स्वच्छता अभियान में आमंत्रित थी। जब तक कैमरे सामने थे, ये सो-कॉल्ड महापुरुष और वीरांगनाएँ न्यू ब्रांड झाड़ूओं से बड़ी नज़ाकत के साथ  अभिनय की मुद्राओं से झाड़ू लगा रहे थे। जैसे ही कैमरे हटे, सबने झाड़ू एक ओर फेंकी, सेनिटाइज़र से हाथ धोये और मन ही मन जो बोला मुझे कन्वे हुआ, उनके मन की बात थी, ‘सारे मीडिया पर छा गए हम तो। कबीर भाई, गांधीजी के सपने का यह हश्र हो रहा है। हॉलीवुड के डायरेक्टर्स ये सोच सोच कर चिंतित हैं कि अगर कहीं लोगों ने स्वच्छ्ता अभियान को दिल से अपना लिया तो भारत की गंदगी के साथ वो फ़िल्में कैसे बनाएंगे, यहां पर गंदगी ढूंढते रह जाएंगे। पर बिचौलियों ने उन्हें कह दिया है,  उनकी चिंता निरर्थक है।”

“मीरा आँखें देखी कहने आई हो तो ज़रा बिटवीन द लाइन्स भी पढ़ना सीखो ज़रा।”

“मंजे काय कबीर भाऊ?”

“मंजे तुमने देखा नहीं, उन नर्सों और कर्मचारियों के आंसू, जिनके मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने स्वच्छता अभियान को उन पर कहर की तरह बरपा रखा है। उन्हें सुबह सात बजे आना पड़ता है, झाड़ू लगाना पड़ता है। वे सब घर से नहा धो कर आते हैं। नर्सें तक अस्पताल में झाड़ू लगाती हैं, फिर उन्ही कपड़ों में मरीज़ों के वार्ड में जाती हैं, जिनसे इन्फेक्शन होने का डर रहता है… यानी यह स्वच्छ्ता अभियान बहुत से लोगों के गले की फांस बन गया है। मीरा तुम एक काम करो, देश के वज़ीरे आज़म के पास जाकर उन्हें उन सभी लोगों की पीर से अवगत कराओ जो गा रहे हैं, दो अक्टूबर के बाद से सफाई की पीर परबत सी हो गयी है। उन्हें एक राज़ की बात भी बता देना, भारत में झाड़ूओं की डिमांड देख कर चीन ने बहुत सी झाड़ू बनाने की फैक्ट्री खोल ली हैं, अपने देश का धन देश में रहे इसके लिए वज़ीरे आज़म स्वदेशी झाड़ूओं का इस्तेमाल करें। और हाँ, ये भी बताना, सफाई अभियान तभी सार्थक होगा जब लोग उसे दिल की गहराई से अपनाएंगे। मेरा यह दोहा उन्हें सुना देना –

“लागी लागी क्या करे, लागी नाहीं एक,

लागी सोई जानिये, पड़ी कलेजे छेक।”

– अलका अग्रवाल सिगतिया

(स्तंभ – मैं कहती आँखों की देखी – प्रकाशित http://aakharhindi.com/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%81%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A5%80/)

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